भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

  भरी  महफ़िल  में  महोतरमा ने फ़रमाया-  साजिश कर रहे हो पास आने की ज़रा सम्भलो  ज़िद कर रहे हो साथ चलने की  ज़रा सम्भलो  न मिलता इश्क़ ऐसे बोलने से क्या करोगे तुम  मर जाते हैं आशिक़ इश्क़ पाने को  ज़रा सम्भलो  हमने भी कह दिया-  नहीं करेंगे साजिश पास आने की  न ही करेंगे ज़िद साथ चलने की अरे हम तो वो  आशिक़  हैं जो एक मर्तबा मुहब्बत का इज़हार करते हैं  आपकी मर्ज़ी खुदा का फरमान समझते हैं  साजिशों  और ज़िदों से इश्क़ पाया नहीं जाता  आशिकी में मरा हुआ आशिक़ कहलाया नहीं जाता  करनी है मुहब्बत तो उससे करो  जिसे तुम्हारे बिन रात दिन भाया नहीं जाता 

मैं एक भारतीय हूँ

 

मैं एक भारतीय हूँ 

न हिन्दू न मुसलमान न सिख और न ही ईसाई 

केवल भारतीय हूँ 


थोड़ा तकलीफ में हूँ 

तकलीफ होती है जब अपनों को दूसरों के रंग में रंगते देखता हूँ 

देखता हूँ उनको पहली जनवरी को नव वर्ष मनाता 

देखता हूँ किसानों को अकेले आंदोलन करता 

कहाँ गया मेरा भारत 

जहाँ जनवरी तो दूर जनवरी नाम का महीना नहीं होता 

जहाँ का किसान कभी अकेला नहीं होता 


मैं एक भारतीय हूँ 

न हिन्दू न मुसलमान न सिख और न ही ईसाई 

केवल भारतीय हूँ 


थोड़ा तकलीफ में हूँ 

तकलीफ होती है जब अपनों को दूसरों के रंग में रंगते देखता हूँ 

देखता हूँ अपनों को हिंदी बोलने में हिचकिचाता 

और अंग्रेजी बड़े गर्व से सुनता सुनाता 

कहाँ गया मेरा भारत 

जहाँ मानस अंग्रेजी तो दूर अंग्रेजों से नफरत करता था 

जहाँ हिंदी को कभी इतना झेलना नहीं पड़ता था


मैं एक भारतीय हूँ 

न हिन्दू न मुसलमान न सिख और न ही ईसाई 

केवल एक भारतीय हूँ

बस थोड़ा तकलीफ में हूँ  

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