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भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

  भरी  महफ़िल  में  महोतरमा ने फ़रमाया-  साजिश कर रहे हो पास आने की ज़रा सम्भलो  ज़िद कर रहे हो साथ चलने की  ज़रा सम्भलो  न मिलता इश्क़ ऐसे बोलने से क्या करोगे तुम  मर जाते हैं आशिक़ इश्क़ पाने को  ज़रा सम्भलो  हमने भी कह दिया-  नहीं करेंगे साजिश पास आने की  न ही करेंगे ज़िद साथ चलने की अरे हम तो वो  आशिक़  हैं जो एक मर्तबा मुहब्बत का इज़हार करते हैं  आपकी मर्ज़ी खुदा का फरमान समझते हैं  साजिशों  और ज़िदों से इश्क़ पाया नहीं जाता  आशिकी में मरा हुआ आशिक़ कहलाया नहीं जाता  करनी है मुहब्बत तो उससे करो  जिसे तुम्हारे बिन रात दिन भाया नहीं जाता 

बहन

                                                                                                                                      उन भाईयों के लिए जिनके पास बहन नहीं है  बहन  ये तो केवल एक ख्वाब है हमारा           रक्षाबन्धन भाई दूज    ये तो जैसे अपनी त्योहारों की लिस्ट में हैं ही नहीं   अपने हाथ में डोरा बाँधा  लेकिन वो भी हमने खुद,  नहीं तो पंडित जी ने बाँधा   बहन   ये तो केवल एक सुनहरा ख्वाब है हमारा   कहीं चलते फिरते कोई भाई बुला दे   तो हम ये भी नहीं कह सकते   " क्या? कुछ कहा क्या ? "   क्योंकि ऐसा सुनने क...

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