भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

  भरी  महफ़िल  में  महोतरमा ने फ़रमाया-  साजिश कर रहे हो पास आने की ज़रा सम्भलो  ज़िद कर रहे हो साथ चलने की  ज़रा सम्भलो  न मिलता इश्क़ ऐसे बोलने से क्या करोगे तुम  मर जाते हैं आशिक़ इश्क़ पाने को  ज़रा सम्भलो  हमने भी कह दिया-  नहीं करेंगे साजिश पास आने की  न ही करेंगे ज़िद साथ चलने की अरे हम तो वो  आशिक़  हैं जो एक मर्तबा मुहब्बत का इज़हार करते हैं  आपकी मर्ज़ी खुदा का फरमान समझते हैं  साजिशों  और ज़िदों से इश्क़ पाया नहीं जाता  आशिकी में मरा हुआ आशिक़ कहलाया नहीं जाता  करनी है मुहब्बत तो उससे करो  जिसे तुम्हारे बिन रात दिन भाया नहीं जाता 

दुर्बलता


क्या सचमुच भगवान जैसा कुछ हुआ है या वर्तमान में ऐसा कुछ है ? या उस समय के मनुष्यों में ही प्राकर्तिक रूप से इतना सामर्थ्य था कि आज हमने उन्हें भगवान की उपाधि दे दी है। क्योंकि ये तो हमारी प्रवर्ति रही है कि जो कोई भी हमसे भिन्न जन्मा है या हमसे अधिक सामर्थ्य के साथ जन्मा उसे हम भगवान की उपाधि दे दिया करते हैं। मुझे आज भी याद है की पास के गाँव में किसी कन्या का जन्म तीन हाथों के साथ हुआ था, तब उनके दर्शन के लिए मेला सा लग गया था, मैं भी अपने माता और पिता के साथ उनके दर्शन के लिए गया था।   

जिस का जवाब है कि ऐसा इसलिए हो रहा है उसे साइंस का नाम दे दिया जाता है और जो अभी तक नहीं सुलझ पाया उसे भगवान का नाम दे दिया जाता है।  

आज का मनुष्य केवल ये सिद्ध करने में लगा है "अहम् ब्रह्मास्मि" अर्थात मैं ही भगवान हूँ। आपुनिच भगवान है।      

मानवता, प्रेम, आदि भाव गए भाड़ में। आज अगर कोई मानस अपने छेत्र में अच्छा कार्य कर दे तो उसे भगवान का दर्जा नहीं दिया जाता क्योंकि हमें ये बर्दाश्त ही नहीं है, बजाए इसके कहा जाता है कि "गॉड हास् ब्लेस्ड हिम विथ सम स्पेशल पावर्स"। 

आज मनुष्य की प्रतिस्पर्धा अपने आप से नहीं है, वो दूसरों से प्रतिस्पर्धा में लगा है। और ये अटल सत्य है कि इतिहास उसे ही याद रखता है जिसने केवल अपने से प्रतिस्पर्धा की हो या कहें जिसने अपना आज अपने कल से बेहतर किया हो।   

श्री राम को एक सामान्य मनुष्य के रूप में रखकर देखिये जो की वो थे भी बस हमीं ने उन्हें भगवान बना दिया है। उन्होंने अपने जीवन काल में कभी भी किसी और से प्रतिस्पर्धा नहीं की, वहीं दूसरी ओर रावण ने सारा संसार अपने वश में करने का दुस्साहस किया और वैसा किया भी, जिसका परिणाम ये हुआ कि रावण का श्री राम के द्वारा वध किया गया। बाली भी इसी का शिकार हुए।   

केवल दो वक्त की रोटी की मारा मारी है। इसी दो वक्त की रोटी के लिए पूरे 14 साल स्कूल में बर्बाद किये। क्यों गए स्कूल क्योंकी माता पिता को बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने का मोह है और उसका रास्ता स्कूल से होकर गुज़रता है। श्री कृष्णा तो केवल एक वर्ष ही गुरुकुल गए। लेकिन अब हम कहेंगे की वो तो भगवान थे ना इसलिए। #जो समझ में ना आये वो भगवान है।   

अच्छा तरीका है अपनी दुर्बलताओं को छुपाने का।  

विद्यार्थी अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा के भाव से ग्रसित है। हम इस बात से परेशान हैं कि क्या हम दो वक्त की रोटी कमा पाएंगे। लेकिन विद्यार्थी में असुरक्षा नहीं जिज्ञासा अच्छी लगती है। वैसे सारा खेल उदर का ही है और साथ में थोड़ा बहुत ऐश्वर्या और सुख सुविधाओं का। पर इस उदर की दो रोटी की जुगाड़ के लिए आज हम सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। अपने व्यवहार में नकारात्मक परिवर्तन ले आते हैं। इतना सब किस लिए बस दूसरों और अपने को यह सिद्ध करने के लिए कि अहम् ब्रह्मास्मि। 

हमें अपने पर इतना भरोसा नहीं कि हमारे उदर को शांत करने के लिए हमें केवल घास फूस रूपी सब्जियों की आवश्यकता है जो कि संबंधों को तोड़कर या व्यवहार में नकारात्मक परिवर्तन लाने से प्राप्त नहीं होती, वो प्राप्त होती है प्रकर्ति की गोद में, जिसकी हमें कोई कीमत भी नहीं चुकानी होती।   

लेकिन इस सब विफलताओं का ज़िम्मेदार समाज है। आज समाज का निर्माण हुआ ही ऐसे है। हम विद्यार्थियों को ये एहसास ही नहीं होता कि हम जो कर रहे हैं वो आखिर क्यों।   

आज हमें ये समझना होगा कि केवल मशहूर होना ही सफलता की निशानी नहीं होती। क्योंकि पर्सनली मुझे ये लगता है कि सफलता के मायने हम उस व्यक्ति के मशहूर होने से लगा सकते हैं। लेकिन फिर याद आता है कि श्री राम और रावण दोनों ही मशहूर हैं लेकिन कारणों में फरक है।  

लेकिन कई जगह आज भी रावण को पूजा जाता है तो इससे हम ये भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि व्यक्ति को जो सही लगे वो करना चाहिए लेकिन केवल इतना तो ध्यान रखी सकते हैं कि हमारे कर्मों का किसी अन्य पर नकारात्मक प्रभाव ना पड़े। नहीं तो रावण और हममें फरक क्या रह जायेगा।  

रही बात स्वर्ग और नर्क की। तो ऐसा कुछ है ही नहीं। सब कुछ इसी धरती पर है। अगर आप सुख की अनुभूति करते हैं, तो वो स्वर्ग है और यदि आप दुःख की अनुभूति करते हैं तो वो नर्क। लेकिन जो कर्म आपको स्वर्ग की अनुभूति करा रहा, वही कर्म दूसरे को नर्क की अनुभूति भी करा सकता है। ये सब व्यक्ति की सोंच पर निर्भर करता है, उसके लिए क्या सुखदायक है और क्या दुखदायक है या कहें कि क्या स्वर्ग है और क्या नर्क है।  

अंत में बात करें अगर स्पिरिट्स/आत्मा की तो जैसा की मैंने पहले कहा था कि जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं होता वो भगवान है। ईविल स्पिरिट्स आर घोस्ट एंड कोंट्ररी स्पिरिट्स आर गॉड।  

वैसे मैं भी ये आर्टिकल लिखकर कोई एहसान या परोपकार का कार्य नहीं कर रहा हूँ। ये मैं स्वीकार करता हूँ कि ये लेख मैं अपने कॉन्टेक्ट्स में से दो चार लोगों की नज़रों में अच्छा दिखने के लिए लिख रहा हूँ। फेम पाने के लिए लिख रहा हूँ।  

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