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भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

  भरी  महफ़िल  में  महोतरमा ने फ़रमाया-  साजिश कर रहे हो पास आने की ज़रा सम्भलो  ज़िद कर रहे हो साथ चलने की  ज़रा सम्भलो  न मिलता इश्क़ ऐसे बोलने से क्या करोगे तुम  मर जाते हैं आशिक़ इश्क़ पाने को  ज़रा सम्भलो  हमने भी कह दिया-  नहीं करेंगे साजिश पास आने की  न ही करेंगे ज़िद साथ चलने की अरे हम तो वो  आशिक़  हैं जो एक मर्तबा मुहब्बत का इज़हार करते हैं  आपकी मर्ज़ी खुदा का फरमान समझते हैं  साजिशों  और ज़िदों से इश्क़ पाया नहीं जाता  आशिकी में मरा हुआ आशिक़ कहलाया नहीं जाता  करनी है मुहब्बत तो उससे करो  जिसे तुम्हारे बिन रात दिन भाया नहीं जाता 

दोस्ती

                                                                                      दोस्ती रिश्ता जो कलम से न लिखा जाये रिश्ता  जिसके बिना न मिटा  जाये रिश्ता जो शब्दों से न सींचा जाये रिश्ता  जो  जन्म   से न खींचा जाये रिश्ता जो दिल से  जीता  और  जिया  जाये रिश्ता जो मरते दम तक  पिया जाये रिश्ता  जो  सभी मतलबों से परे हो रिश्ता  जो कभी  भूले  से न  भूले   हो रिश्ता  जो फूल सा कोमल चट्टान सा मजबूत  हो रिश्ता  जिसके बिना सब कुछ फीका सा महसूस हो         दोस्ती यारी      सारी आपकी हमारी         न जाने कब पड़ गयी अच्छे अच्छों पर भारी

यार तू कहाँ

                                                                                                           या......र तू कहाँ..... मुझे बता.....  ओ यारा  या......र तू कहाँ..... मुझे बता.....          पैसों  की  कीमत   क्या रिश्तों से  ऊपर एक दोस्त मेरा पक्का कुछ रोज़ पहले मुझे छोड़ गया क्यों क्योंकि पैसों की कीमत वो मुझसे ऊपर तोल गया या......र तू कहाँ..... मुझे बता.....  ओ यारा  या......र तू कहाँ..... मुझे बता..... तू रुक ज़रा ठहरजा पहले से कितना बदल गया ये ज़रा समझ जा आज कल तो लोग पड़ोसी को नहीं पहचान रहे पहचान रहे अगर तो उसके सुख को नहीं मान रहे रिश्तों को पीछे छोड़ पैसों के चक्कर में जीवन के सच्ची मोती खोल रहे कोर्ट में गवाह पलट जा रहे इंसान की...

लोगों को बहुत कहते सुना है

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लोगों को बहुत कहते सुना है    पुलिस की नौकरी में बंदिशें बहुत हैं  पुलिस की नौकरी में खतरे बहुत हैं  बे वक्त की नौकरी है लोग हमेशा शक की निगाह से देखते हैं  जाने से पहले सौ बार सोचते हैं  उनका आना अपशगुन समझते हैं      लोगों को बहुत कहते सुना है  पर हम ये क्यों नहीं समझ पाते  त्योहार तक का उनके कोई ठिकाना नहीं होता  मौत के आने का कोई फसाना नहीं होता  बस केवल ढुलते रहना होता है   महीनों बीत जाते हैं उनको अपनों से मिले  हम तो चार दिन में ही बौखला जाते हैं  अजी  जनाब  इतिहास को तो छोड़ ही दीजिये  अभी का नज़ारा ही पिरो लीजिये  घर वालों को तो पता ही नहीं है  उनका बेटा पति या बाप  क्या मिल पायेगा उन्हें बहाल  न खाने की सुध न पीने की सुध  बस चलता चला जा रहा है    बस चलता चला जा रहा है  कहीं बाप की तरह उठक बैठक लगवा रहा है  कहीं सब्जी तो कहीं दवाई पहुँचा रह...

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