भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

  भरी  महफ़िल  में  महोतरमा ने फ़रमाया-  साजिश कर रहे हो पास आने की ज़रा सम्भलो  ज़िद कर रहे हो साथ चलने की  ज़रा सम्भलो  न मिलता इश्क़ ऐसे बोलने से क्या करोगे तुम  मर जाते हैं आशिक़ इश्क़ पाने को  ज़रा सम्भलो  हमने भी कह दिया-  नहीं करेंगे साजिश पास आने की  न ही करेंगे ज़िद साथ चलने की अरे हम तो वो  आशिक़  हैं जो एक मर्तबा मुहब्बत का इज़हार करते हैं  आपकी मर्ज़ी खुदा का फरमान समझते हैं  साजिशों  और ज़िदों से इश्क़ पाया नहीं जाता  आशिकी में मरा हुआ आशिक़ कहलाया नहीं जाता  करनी है मुहब्बत तो उससे करो  जिसे तुम्हारे बिन रात दिन भाया नहीं जाता 

बहुत याद आता है..

        
                                                                                                
एक बच्चे के अपनी माँ के लिए जज़्बात 
जिन्हें उसने अपने होश-आवास में गवाँ दिया हो 

वो बच्चा क्या करेगा अपने दर्द को बयाँ 
      जिसने कभी अपनी माँ का आँचल महसूस ही न हो किया        
वो लाडला भी क्या करेगा अपने दर्द को बयाँ 
जिसने कभी अपनी माँ का आँचल महसूस ही न हो किया 
अरे यारों माँ कि ममता का तो उससे पूछो 
जिसने अपनी माँ को होश-आवास में दिया हो गवाँ

वो बच्चा क्या करेगा अपने दर्द को बयाँ 
जिसके ऊपर हो माँ का साया 
वो लाडला भी क्या करेगा अपने दर्द को बयाँ
जिसके ऊपर हो माँ का साया 
अरे यारों माँ कि ममता का तो उससे पूछो 
जिसने अपनी माँ को होश-आवास में दिया हो गवाँ


 वो खुद गीले बिस्तर पर सोना हो 
और मुझे सूखे में सुलाना 
वो खुद बासी खाना हो 
और मुझे ताज़ी खिलाना 

बैंक तो कर्ज़ फिर भी ब्याज दर पर देती है 
जिसे आज नहीं तो कल मैं दूँगा चुका
पर बस एक माँ ही है जिसका कर्ज़ मैं नहीं पाउँगा जन्मों जनम चुका
वो पिता जी के सामने मेरी बड़ी से बड़ी गलती का हो छुपाना 
वो बड़ी से बड़ी गलती पर भी अपने सीने से हो मुझे लगाना 
बहुत बहुत बहुत याद आता है 

वो छोटी छोटी सी चोट पर 
तुहारा घर को सर पर उठा लेना 
वो छोटे छोटे से जख़्म पर 
तुम्हारा प्यार से सहलाना

वो कोई स्पेशल चीज़ बना 
खुद न खा हम सब को खिलाना 
ताकि पड़ न जाये वो चीज़ कम
और ख़त्म हो जाये वो चीज़ अगर 
तो बर्तन में लगे हुए से ही 
लेलेना उसका आनंद

वो खुद पुराना कपड़ा पहनना हो 
और मुझे नया पहनना
वो मेरी छोटी से छोटी हरकतों पर 
अपने दुख को छिपा एक बड़ा सा मुस्कुराना 
बहुत याद आता है , बहुत याद आता है..

  आंटी के हाथ कि रोटी गले से नहीं है उतरती 
माँ आंटी के हाथ कि रोटी गले से नहीं है उतरती 
अब तेरे हाथ की बनाई रोटी का नूर समझ गया हूँ मैं
माँ समझ गया हूँ मैं 

माँ तू मेरी खोई हुई चीज़ों का पता है 
तू ही मेरी आदत है , तू ही धड़कन है 
तुझी से सब कुछ शुरू तुझी पे सब कुछ कुर्बान है 
माँ तुझी पे सब कुछ कुर्बान है

माँ तू जहाँ हो खुश रहना 
मेरी कमी को कभी हावी न होने देना 
क्योंकि मैं कमबख्त तेरी मौजूदगी में 
तेरे इस प्यार को संभाल न पाया
और लवजों में तेरे प्यार को कभी बयाँ कर न पाया 

तेरी कमी मुझे अब खलने लगी है
माँ
तेरी कमी अब मुझे खलने लगी है 
अब तू मुझे बहुत याद आने लगी है..

माँ तू है तो मैं कुछ भी कर जाने का जज़्बा रखता हूँ
अब तू ही नहीं तो अपने आपको बहुत अकेला महसूस करता हूँ 
और रब से बस यही दुआ करता हूँ 
कि कभी किसी बच्चे से माँ का साया न छीनना
क्योंकि माँ ही बच्चे का मान स्वाभिमान और है अभिमान 

माँ अब तेरी आहट को महसूस करने मैं लगा हूँ 
तेरे दीदार को तरसने मैं लगा हूँ 
ज़िन्दगी तो दिशाहीन लगने लगी है 
ज़िन्दगी 
तो दिशाहीन लगने लगी है 
फिर भी रब से बस यही दुआ करता हूँ 
एक बार मिला दे मुझे मेरी माँ से 
एक बार मिलके उसका धन्यवाद कर आशीर्वाद लेना चाहता हूँ 
उसे मिलकर ये बताना चाहता हूँ 
कि उसका बेटा अब रिश्तों कि अहमियत समझने लगा है 
कि उसका बेटा उससे कितना प्यार करता है 
और उसे गले लगाने के लिए तड़प रहा है
और उसे गले लगाने के लिए तड़प रहा है 

Thanks for Reading
Keep Smiling

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

Winning Activity is all about love, care and affection.

महसूस होगा

बहन

भरी महफ़िल में महोतरमा ने फ़रमाया-

दुर्बलता

लोगों को बहुत कहते सुना है

दोस्ती

एक दिन

दिल से दिल की मुक्कालात